war impact on india: मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) के अनुसार, मिडिल ईस्ट संकट के चलते अगर तेल की सप्लाई लंबे समय तक बाधित रही, तो भारत की जीडीपी ग्रोथ 6% से नीचे गिर सकती है.

war impact on india: मिडिल ईस्ट यानी पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चली आ रही तनातनी अभी शांत भी नहीं हुई थी कि अब इजरायल और ईरान के बीच सीधी जंग शुरू हो गई है. इस युद्ध की वजह से दुनिया के कई देशों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. सबसे ज्यादा परेशानी उन देशों को हो रही है जो अपनी जरूरतों के लिए दूसरे देशों से कच्चा तेल खरीदते हैं. भारत भी दुनिया के उन बड़े देशों में शामिल है जो अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी कच्चा तेल खाड़ी देशों से मंगाता है. हॉर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) के बंद होने से तेल की सप्लाई पर बहुत बुरा असर पड़ा है. हालांकि सरकार के बैकअप प्लान की वजह से फिलहाल देश में तेल और गैस का संकट काफी हद तक काबू में है. भारतीय इकोनॉमी तमाम चुनौतियों के बाद भी मजबूत है, लेकिन आने वाले समय के लिए खतरा अभी टला नहीं है.
भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने इस युद्ध के दूरगामी असर को लेकर एक बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा है कि मिडिल ईस्ट के तनाव के कारण अगर सप्लाई चेन में लंबे समय तक रुकावट रहती है, तो इसका खामियाजा सिर्फ भारत को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ेगा. नागेश्वरन ने एक खास बातचीत में साफ किया कि भारत के लिए सबसे बड़ी फिक्र की बात यह है कि अगर यह युद्ध इस साल के आखिरी महीनों तक भी खिंच गया, तो कच्चे तेल के दाम आसमान छू सकते हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि भले ही हमारी अर्थव्यवस्था अभी मजबूत स्थिति में है, लेकिन तेल बाजार में लंबे समय तक उथल पुथल रहने से देश की तरक्की, महंगाई और सरकारी खजाने पर सीधा असर पड़ सकता है.
मुख्य आर्थिक सलाहकार के मुताबिक बेहतर आर्थिक संकेतकों, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और तेल की कीमतों में आई थोड़ी नरमी के कारण भारत की स्थिति उम्मीद से बेहतर है. जब पश्चिम एशिया में यह विवाद शुरू हुआ था, तब तेल के दाम अचानक बहुत बढ़ गए थे. लेकिन राहत की बात यह है कि अब कीमतें दोबारा पुराने स्तर पर आ गई हैं. मार्च और अप्रैल के आर्थिक आंकड़ों को देखें तो साफ होता है कि वैश्विक संकट के बावजूद भारतीय बाजार मजबूती से टिका हुआ है. लेकिन सबसे बड़ी अनिश्चितता इस बात को लेकर है कि आगे चलकर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका क्या असर होगा. अगर तेल का उत्पादन ऐसे ही प्रभावित रहा और समुद्री व्यापार के रास्ते बंद रहे, तो देश की आर्थिक विकास दर सुस्त पड़ सकती है. सबसे खराब हालात में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 6 फीसदी से भी नीचे जा सकती है.
नागेश्वरन ने यह भी समझाया कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार होने वाली बढ़ोतरी किस तरह पूरी इकोनॉमी का गणित बिगाड़ देती है. जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो फैक्ट्रियों, ट्रांसपोर्ट और आम बिजनेस की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. इस बढ़े हुए खर्च का बोझ या तो सरकार और तेल कंपनियों को उठाना पड़ता है या फिर आम जनता को. अगर सरकार इस घाटे को खुद संभालती है, तो देश का राजकोषीय घाटा बढ़ जाता है और सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ता है. दूसरी तरफ, अगर इस बढ़े हुए खर्च का बोझ आम उपभोक्ताओं पर डाला जाता है, तो देश में महंगाई बहुत तेजी से बढ़ जाएगी. महंगाई बढ़ने से आम लोग अपने घरेलू खर्चों में कटौती करने लगेंगे. यानी किसी भी सूरत में महंगा तेल देश की तरक्की और आर्थिक गतिविधियों को नुकसान पहुंचाता है.
विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की स्थिति पर बात करते हुए आर्थिक सलाहकार ने कहा कि भारत का फॉरेक्स रिजर्व हमारे लिए सबसे बड़ी राहत की बात है. फिलहाल हमारे पास इतना विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है जो करीब 11 महीने के आयात के खर्च को आसानी से संभाल सकता है. यह भंडार किसी भी बाहरी आर्थिक झटके के खिलाफ एक मजबूत ढाल की तरह काम करता है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि देश में 1991 जैसा आर्थिक संकट आने की कोई गुंजाइश नहीं है. सरकार ने हाल ही में विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए जो भी कदम उठाए थे, वे केवल सुरक्षा के लिहाज से लिए गए थे. वहीं डॉलर के मुकाबले रुपये में आ रही गिरावट पर उन्होंने कहा कि इसमें हैरान होने की बात नहीं है. पिछले एक साल में केवल भारतीय रुपया ही नहीं बल्कि जापानी येन, दक्षिण कोरियाई वॉन, इंडोनेशियाई रुपिया और थाई बात जैसी तमाम एशियाई मुद्राएं भी डॉलर के सामने कमजोर हुई हैं.
