India eu historic trade deal: भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच व्यापार समझौता लगभग फाइनल है, जिससे दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जुड़ेंगी. यह डील अमेरिका के दबाव के बीच भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक और कूटनीतिक लाभ साबित हो सकती है.

India eu historic trade deal: भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच एक ऐतिहासिक व्यापार समझौता लगभग तय माना जा रहा है. दोनों पक्ष लंबे समय से इस डील पर बातचीत कर रहे थे. अब यह प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच गई है. भारत के वाणिज्य सचिव ने साफ कहा है कि 24 में से 20 अध्यायों पर सहमति बन चुकी है. कोशिश है कि इसी महीने के अंत तक समझौते को पूरा कर लिया जाए. यूरोपीय यूनियन के बड़े नेता भी इसी दौरान भारत दौरे पर आने वाले हैं. ऐसे में इस डील को लेकर उम्मीदें और बढ़ गई हैं.
इस व्यापार समझौते की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर लगातार सख्त रुख अपना रहे हैं. अमेरिका ने भारत पर भारी टैरिफ लगाए हैं. इसी दबाव के बीच भारत नए और भरोसेमंद बाजार तलाश रहा है. यूरोपीय यूनियन भी अमेरिका की अनिश्चित नीतियों से परेशान है. यही वजह है कि दोनों पक्ष तेजी से समझौते की ओर बढ़ रहे हैं. अगर यह डील फाइनल होती है तो अमेरिका को कूटनीतिक और आर्थिक दोनों स्तर पर झटका लग सकता है.
यह समझौता कई मायनों में दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड डील बन सकता है. यूरोपीय यूनियन की आबादी करीब 45 करोड़ है. भारत की आबादी लगभग 140 करोड़ है. दोनों मिलकर दुनिया की एक चौथाई आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह समझौता दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाएगा. यूरोपीय यूनियन की अर्थव्यवस्था करीब 19.5 ट्रिलियन डॉलर की है. भारत की अर्थव्यवस्था 4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच चुकी है. भारत की विकास दर भी तेजी से आगे बढ़ रही है.
हालांकि बातचीत आसान नहीं रही है. कृषि, कार्बन टैक्स, व्हिस्की और ऑटोमोबाइल जैसे मुद्दे सबसे ज्यादा संवेदनशील रहे हैं. भारत खेती से जुड़े मामलों में कोई समझौता नहीं करना चाहता. यही वजह है कि इन मुद्दों को समझदारी से संभाला जा रहा है. यूरोप में भी किसान व्यापार समझौतों का विरोध कर रहे हैं. ऑटोमोबाइल सेक्टर में यूरोपीय देशों का दबाव है. वहीं भारत अपने घरेलू उद्योग और रोजगार को लेकर सतर्क है.
कुल मिलाकर यह डील भारत के लिए 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद सबसे अहम समझौतों में से एक मानी जा रही है. इससे भारत को नए बाजार मिलेंगे. यूरोप को भारत जैसा बड़ा उपभोक्ता आधार मिलेगा. बदलते वैश्विक हालात में यह समझौता ताकत का नया संतुलन बना सकता है. यही कारण है कि दुनिया की नजरें इस डील पर टिकी हुई हैं.
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