America india china relations: अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति के बीच उसका बढ़ता कर्ज उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरा है, जहां भारत और चीन जैसे देश अहम भूमिका निभा सकते हैं. भारत संतुलन की रणनीति अपनाते हुए अमेरिका, चीन और वैश्विक मंचों के बीच अपनी अहमियत बनाए हुए है, जिससे अमेरिका भी उस पर निर्भर नजर आता है.
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America india china relations: अमेरिका और भारत-चीन के रिश्तों में इन दिनों काफी तनाव दिखाई दे रहा है. डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की विदेश नीति और ज्यादा आक्रामक हो गई है. कभी ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात हो रही है, तो कभी ईरान पर हमले की धमकी दी जा रही है. भारत और चीन जैसे देशों पर भी अमेरिका ने सख्त तेवर दिखाए हैं. रूस से तेल खरीदने को लेकर दोनों देशों पर भारी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी गई है. इससे साफ है कि अमेरिका दबाव की नीति अपना रहा है.
इस बीच अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी उसका बढ़ता कर्ज माना जा रहा है. जनवरी 2026 तक अमेरिका पर करीब 38.43 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज हो चुका है. हर साल यह तेजी से बढ़ रहा है. ब्याज चुकाने का बोझ भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. अमेरिका इस कर्ज को संभालने के लिए ट्रेजरी बॉन्ड और बिल जारी करता है. इन्हें विदेशी देश बड़ी मात्रा में खरीदते हैं. यही वजह है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था अभी तक संभली हुई है.
चीन इस समय अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा विदेशी कर्जदाता है. उसके पास करीब 759 बिलियन डॉलर के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड हैं. भारत के पास भी अमेरिकी बॉन्ड का अच्छा खासा हिस्सा है. अगर भारत और चीन मिलकर इन बॉन्ड्स की बड़े पैमाने पर बिक्री करें, तो अमेरिका को भारी झटका लग सकता है. ब्याज दरें बढ़ेंगी. डॉलर कमजोर हो सकता है. इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा. इसी वजह से अमेरिका इन देशों पर पूरी तरह सख्ती नहीं दिखा पाता.
भारत और चीन के रिश्तों में भी हाल के महीनों में सुधार देखने को मिला है. मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद बातचीत आगे बढ़ी है. सीमा विवाद पर चर्चा फिर शुरू हुई है. वीजा नियमों में ढील दी गई है. धार्मिक यात्राओं को भी मंजूरी मिली है. इसी के साथ रूस, चीन और भारत के बीच RIC जैसे मंच फिर से चर्चा में आ गए हैं. यह अमेरिका के नेतृत्व वाले QUAD के लिए चुनौती बन सकता है.
दूसरी ओर भारत संतुलन की नीति पर चल रहा है. अमेरिका उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. वहीं चीन पर भारत की कई आर्थिक निर्भरताएं भी हैं. भारत BRICS जैसे मंच के जरिए डॉलर के विकल्प तलाश रहा है. स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा दिया जा रहा है. यही वजह है कि अमेरिका भी भारत को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर पा रहा. चिप्स, एआई और तकनीक के क्षेत्र में भारत की भूमिका अब अमेरिका के लिए बेहद अहम हो चुकी है.
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