केदारनाथ धाम के लिए 325वें रावल (मुख्य पुजारी) की नियुक्ति एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक घटना है. रावल का पद न केवल धार्मिक है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपराओं का प्रतीक भी है.
Kedarnath Yatra 2026: केदारनाथ धाम के नए रावल शिवाचार्य शांति लिंग बनाए गए हैं. वे 325वां रावल बने हैं. बताया जा रहा है कि केदारनाथ के मौजूदा रावल 70 साल के भीमाशंकर लिंग ने स्वास्थ्य की वजह से पद संभालने में असमर्थ जताई है. इसके साथ ही उन्होंने अपने शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है.
महाशिवरात्रि पर ऐलान
महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित अपने मठ में उन्होंने कहा कि वह स्वास्थ्य कारणों से अब केदारनाथ के रावल का पद संभालने में असमर्थ हैं. इसलिए वह अपने शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हैं. 15 फरवरी यानी महाशिवरात्रि पर रावल के इस लिखित बयान की विधिवत घोषणा पंचकेदार गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर उखीमठ में केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि घोषित होने के साथ होगी.
सदियों पुरानी परंपरा
घोषणा के दौरान पंचगांई के डंगवाड़ी, भटवाड़ी, चुन्नी-मंगोली, किमाणा एवं पठाली डुंगर सेमला के हक-हकूकधारी और दस्तूरधारी ग्रामीण भी मौजूद रहेंगे. आपको बता दें, केदारनाथ के रावल अविवाहित होते हैं. कर्नाटक के वीर शैव संप्रदाय से संबंध रखते हैं और शिव उपासक होते हैं. रावल परंपरानुसार केदारनाथ की पूजा के मुख्य कर्ताधर्ता होते हैं. रावल केदारनाथ मंदिर के कपाट खुलने और कपाट बंद होने पर धाम में रहते हैं. करीब चार सौ से भी अधिक वर्षों से ये परंपरा चली आ रही है. इसी के तहत भुकुंड लिंग केदारनाथ के पहले रावल थे. यह परंपरा आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित मानी जाती है.
कैसे चुने जाते हैं केदारनाथ के रावल?
केदारनाथ के रावल का चयन कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है, इसके लिए शास्त्रों और परंपराओं के कड़े नियमों का पालन किया जाता है: ऐसी मान्यता है कि प्राचीन काल में रावल बनाने के लिए ऐसे बालक का चुनाव किया जाता था, जिसके शरीर पर जन्म से ही मांस की जनेऊ होती थी. ऐसे बच्चे को भगवान बद्रीविशाल की सेवा के लिए समर्पित कर दिया जाता था. आज भी यह परंपरा और आस्था बद्रीनाथ धाम में उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है.
अब अगर केदारनाथ धाम के रावल के चुनाव की बात करें तो यहां पहले रावल की नियुक्ति टिहरी के शाही परिवार द्वारा होती थी, लेकिन 1948 के अधिनियम के बाद अब यह अधिकार श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) के पास है. हालांकि, अक्सर मौजूदा रावल अपने जीवनकाल में ही अपने किसी योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी (नायब रावल) चुनते हैं. वर्तमान रावल की मृत्यु या पद छोड़ने के बाद इस शिष्य को विधिवत तिलक समारोह के माध्यम से रावल घोषित किया जाता है. अक्सर रावल सीधे नहीं चुने जाते। पहले उन्हें ‘पार्षद’ या ‘नायब रावल’ के रूप में नियुक्त किया जाता है, जहाँ उनकी सेवा और भक्ति को परखा जाता है.
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