stalin vs dharmendra pradhan: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने नई शिक्षा नीति के ‘तीन भाषा फॉर्मूले’ को हिंदी थोपने की कोशिश बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है, जिस पर केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने पलटवार करते हुए इसे मातृभाषा को बढ़ावा देने वाली नीति करार दिया है. विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े राज्य में इस भाषाई विवाद ने एक बार फिर 1960 के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलनों की यादें ताजा कर दी हैं.

stalin vs dharmendra pradhan: तमिलनाडु में तीन भाषा फॉर्मूले को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है. इस मुद्दे पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री M. K. Stalin और केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तीखी बहस देखने को मिली. विवाद की जड़ National Education Policy 2020 है. जिसमें स्कूलों के लिए तीन भाषा फॉर्मूला रखा गया है. यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है जब राज्य में विधानसभा चुनाव का माहौल भी बन रहा है. इसलिए इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है.
साल 2020 में केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति लागू की थी. इस नीति का मकसद देश की शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और बेहतर बनाना बताया गया था. इसी नीति में तीन भाषा फॉर्मूला शामिल है. इसके तहत स्कूलों में बच्चों को तीन भाषाएं पढ़ाई जाएंगी. इनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय होनी चाहिए. हाल ही में Central Board of Secondary Education यानी CBSE ने इसी नीति के आधार पर नए पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार की है. इसके बाद यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया.
मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस नीति का कड़ा विरोध किया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि यह शिक्षा सुधार नहीं है. बल्कि हिंदी को पूरे देश में फैलाने की कोशिश है. उनका कहना है कि यह नियम एकतरफा है. दक्षिण भारत के बच्चों से हिंदी सीखने की उम्मीद की जाती है. लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में तमिल या तेलुगु पढ़ाने की व्यवस्था नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि कई केंद्रीय स्कूलों में तमिल पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक भी नहीं हैं. ऐसे में यह नीति लागू करना सही नहीं लगता.
स्टालिन ने यह भी आरोप लगाया कि बिना पर्याप्त तैयारी के यह नीति राज्यों पर थोपी जा रही है. उनका कहना है कि अगर स्कूलों में शिक्षक और संसाधन ही नहीं होंगे तो बच्चों को सही शिक्षा कैसे मिलेगी. उन्होंने यह भी कहा कि इस नीति का असर नौकरियों पर भी पड़ सकता है. उनके मुताबिक हिंदी भाषी राज्यों के बच्चों को इससे फायदा मिल सकता है. जबकि दूसरे राज्यों के बच्चे पीछे रह सकते हैं.
वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इन आरोपों को गलत बताया. उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में कहीं भी हिंदी को अनिवार्य नहीं बनाया गया है. उनके अनुसार यह कहना कि हिंदी थोपी जा रही है, पुरानी राजनीति है. उन्होंने कहा कि यह नीति हर बच्चे को उसकी मातृभाषा में पढ़ने का अवसर देती है. साथ ही सभी भारतीय भाषाओं को बराबर सम्मान देती है. उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व में तमिल भाषा और संस्कृति को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है. हालांकि तमिलनाडु में हिंदी को लेकर विवाद नया नहीं है. 1960 के दशक में भी हिंदी विरोधी आंदोलन हुए थे. जिनका असर आज तक राज्य की राजनीति में दिखाई देता है.
