TMC Political Crisis: यह लेख तृणमूल कांग्रेस के भीतर चुनाव हार के बाद उपजे असंतोष और आंतरिक कलह को दर्शाता है, जो समय के साथ एक बड़े राजनीतिक विद्रोह में बदल गया. इसमें 58 विधायकों के बागी गुट द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को नया नेता चुनने और ‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ के तहत ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती देने के पूरे घटनाक्रम को स्पष्ट किया गया है.

TMC Political Crisis: तृणमूल कांग्रेस में हाल में हुई बगावत किसी एक दिन की घटना नहीं थी. इसकी शुरुआत विधानसभा चुनाव में मिली हार के तुरंत बाद ही हो गई थी. पार्टी के भीतर लंबे समय से असंतोष पनप रहा था. कई नेताओं और विधायकों को लगने लगा था कि संगठन और सत्ता का केंद्र धीरे-धीरे कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित होता जा रहा है. इसी नाराजगी ने आगे चलकर बड़े राजनीतिक संकट का रूप ले लिया. 4 मई को चुनाव नतीजे आने के बाद पार्टी में बेचैनी साफ दिखाई देने लगी. कई विधायक अंदर ही अंदर नेतृत्व के तौर-तरीकों से असहज थे. हालांकि शुरुआत में यह असंतोष खुलकर सामने नहीं आया. लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए और विरोध की आवाजें तेज होती चली गईं.
चुनाव हारने के दो दिन बाद 6 मई को नए विधायकों की एक अहम बैठक बुलाई गई. इस बैठक में ममता बनर्जी ने कथित तौर पर अभिषेक बनर्जी के योगदान की सराहना करने की बात कही. उनका मकसद पार्टी में उनके काम को सम्मान दिलाना था. लेकिन कुछ विधायकों ने इसे अलग नजरिए से देखा. उन्हें लगा कि पार्टी में एक ही परिवार का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है. इसी बैठक के बाद नेताओं के बीच फुसफुसाहट शुरू हो गई. कई लोग खुलकर कुछ नहीं बोल रहे थे. लेकिन अंदरूनी नाराजगी बढ़ने लगी थी. यही वह समय था जब बगावत के बीज और गहरे होने लगे. पार्टी नेतृत्व को शायद उस समय अंदाजा नहीं था कि यह असंतोष आगे चलकर इतना बड़ा रूप ले सकता है.
विरोध पहली बार सार्वजनिक रूप से 19 मई को सामने आया. पार्टी की एक बैठक में विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने कुछ फैसलों पर सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि फाल्टा के विधायक जहांगीर खान के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई. जबकि उन्होंने चुनाव से हटने की घोषणा की थी. चूंकि उन्हें अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था. इसलिए इस सवाल को सीधे तौर पर अभिषेक के प्रभाव को चुनौती देने के रूप में देखा गया. इसी दौरान कुछ अन्य नेताओं ने भी संगठन की कार्यप्रणाली को लेकर चिंता जताई. हालांकि बाद में कुछ नेता पीछे हट गए. लेकिन विरोध का स्वर अब खुलकर सामने आ चुका था. पार्टी के भीतर दो अलग-अलग सोच वाले समूह बनने लगे थे.
22 मई को घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया. उस दिन ऋतब्रत बनर्जी दिल्ली पहुंचे हुए थे. वे राज्यसभा का कार्यकाल पूरा होने के बाद कुछ औपचारिक काम निपटाने आए थे. इसी दौरान बंग भवन में उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हो गई. यह मुलाकात कुछ ही सेकंड की बताई गई. लेकिन इसके राजनीतिक मायने बहुत बड़े निकले. बाद में ऋतब्रत ने शुभेंदु अधिकारी के उस फैसले की तारीफ की जिसमें विपक्षी नेताओं को भी प्रशासनिक बैठकों में बुलाने की बात कही गई थी. उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू कर दी. लोगों ने इसे बदलते समीकरणों का संकेत माना. इसके बाद पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और ज्यादा चर्चा में आ गई.
25 मई को एक और विवाद सामने आया. आरोप लगा कि विधानसभा में जमा किए गए कुछ दस्तावेजों पर विधायकों के हस्ताक्षर असली नहीं थे. यह मामला तेजी से बढ़ा. 27 मई को ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने स्पीकर से औपचारिक शिकायत कर दी. उन्होंने जालसाजी का आरोप लगाया. इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने पुलिस से संपर्क किया और मामले की जांच शुरू हो गई. इस विवाद ने पार्टी के अंदर चल रहे संघर्ष को और गहरा कर दिया. अब मामला केवल राजनीतिक मतभेद तक सीमित नहीं रहा. बल्कि कानूनी जांच तक पहुंच गया. इससे पार्टी नेतृत्व पर दबाव लगातार बढ़ता गया.
31 मई तक हालात और गंभीर हो गए. ममता बनर्जी ने कालीघाट स्थित अपने आवास पर विधायकों की बैठक बुलाई. उम्मीद थी कि इससे पार्टी एकजुटता का संदेश दे पाएगी. लेकिन बैठक में अपेक्षा से कम विधायक पहुंचे. इससे यह संकेत मिला कि पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ रही है. अगले ही दिन यानी 1 जून को स्थिति और बिगड़ गई. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से बताया कि शिकायतों के आधार पर जांच शुरू हो चुकी है. इसके कुछ घंटों बाद ही पार्टी ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को निष्कासित कर दिया. लेकिन यह फैसला उल्टा पड़ गया. विरोध शांत होने के बजाय और तेज हो गया.
पार्टी से निकाले जाने के बाद दोनों नेताओं ने नेतृत्व पर खुलकर हमला बोला. उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन की सारी ताकत कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित होती जा रही है. इसी दौरान बागी खेमे के अभियान को एक नया नाम मिला. इसे “ऑपरेशन क्राउन प्रिंस” कहा जाने लगा. यह नाम सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया गया. पार्टी ने 2 जून को स्थिति संभालने की कोशिश की. स्पीकर को नए दस्तावेज भेजे गए. लेकिन तब तक बागी गुट का समर्थन लगातार बढ़ चुका था. कई विधायक खुलकर उनके साथ खड़े दिखाई देने लगे.
आखिरकार 3 जून को पूरे घटनाक्रम का निर्णायक मोड़ सामने आया. 58 विधायकों के एक समूह ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा. इसमें ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुने जाने की जानकारी दी गई. साथ ही नई नेतृत्व टीम का प्रस्ताव भी रखा गया. स्पीकर ने इस दावे को स्वीकार कर लिया. इसके साथ ही बागी गुट को आधिकारिक मान्यता मिल गई. इस फैसले ने साफ कर दिया कि टीएमसी के भीतर चल रही नाराजगी अब पूरी तरह खुली बगावत में बदल चुकी है. चुनावी हार के बाद शुरू हुआ असंतोष आखिरकार नेतृत्व परिवर्तन की मांग तक पहुंच गया. बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले समय में बड़े बदलावों का संकेत माना जा रहा है.
