uae leaves opec plus impact: यूनाइटेड अरब अमीरात ने ओपेक और ओपेक प्लस से अलग होने का बड़ा फैसला लिया है, जिससे वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता की संभावना बढ़ गई है. हालांकि, ओपेक के नियमों से बाहर होने के बाद यूएई द्वारा उत्पादन बढ़ाने और उसकी सुरक्षित पाइपलाइन के जरिए सप्लाई जारी रखने से भारत को तेल कीमतों में राहत मिल सकती है.
uae leaves opec plus impact: हाल के दिनों में तेल बाजार से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है. यूनाइटेड अरब अमीरात ने तेल उत्पादक देशों के समूह OPEC और OPEC+ को छोड़ने का फैसला किया है. यह फैसला ऐसे समय आया है. जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ा हुआ है. ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग बंद हो चुका है. इससे तेल और गैस की सप्लाई पर बड़ा असर पड़ा है.
ओपेक एक ऐसा संगठन है. जो दुनिया के बड़े तेल निर्यातक देशों को एक साथ लाकर उत्पादन और कीमतों को संतुलित रखने का काम करता है. इसकी शुरुआत साल 1960 में हुई थी. इसमें सऊदी अरब , इराक, कुवैत और वेनेजुएला जैसे देश शामिल रहे हैं. वहीं ओपेक प्लस में रशिया जैसे गैर-ओपेक देश भी जुड़े हैं. ये देश मिलकर दुनिया के बड़े हिस्से का तेल उत्पादन करते हैं. इसलिए इनके फैसलों का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है.
अब यूएई के इस फैसले का असर सीधे भारत जैसे देशों पर भी पड़ सकता है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा बाहर से तेल खरीदता है. ऐसे में सप्लाई में थोड़ी भी कमी या ज्यादा होने से कीमतों में बदलाव आता है. हालात पहले ही मुश्किल हैं. क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से करीब 20 प्रतिशत तेल सप्लाई प्रभावित हुई है. भारत का मध्य पूर्व से तेल आयात काफी घट गया है. ऐसे में देश को दूसरे विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं.
हालांकि यूएई का ओपेक छोड़ना कुछ मामलों में भारत के लिए राहत भी दे सकता है. यूएई के पास हबशान-फुजैरा पाइपलाइन है. जो होर्मुज के बाहर से तेल सप्लाई करती है. इस वजह से वह बिना रुकावट तेल बेच सकता है. अब ओपेक के नियमों से बाहर होने के बाद यूएई अपनी पूरी क्षमता से तेल उत्पादन कर सकेगा. इससे बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ सकती है. और कीमतों में थोड़ी नरमी देखने को मिल सकती है.
फिर भी स्थिति पूरी तरह आसान नहीं है. अगर ओपेक प्लस के देशों के बीच मतभेद बढ़ते हैं. तो बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है. इससे तेल की कीमतें ऊपर-नीचे हो सकती हैं. इसका असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर भी पड़ेगा. इसलिए आने वाले समय में तेल बाजार की दिशा काफी हद तक इन बड़े देशों के फैसलों पर निर्भर करेगी.
