जंतर-मंतर पर देशव्यापी छात्र आंदोलन हुआ… दिल्ली से लेकर पटना और सीवान तक हिंसा की खौफनाक खबरें आईं। मुंबई के शिवाजी गार्डन से लेकर कोलकाता तक इस आंदोलन की आग पहुंचने लगी थी और देखते ही देखते कई राज्यों में प्रदर्शन हिंसक झड़पों में तब्दील होने लगा था। लेकिन दिल्ली के सबसे करीबी राज्य उत्तर प्रदेश में जैसे ही इस आंदोलन की आग पहुंची, उसकी आंच धीमी पड़ गई! उत्तर प्रदेश में छात्रों का प्रदर्शन तो हुआ, लेकिन दिल्ली, बिहार और दूसरे राज्यों में कुछ अराजक तत्वों ने जैसी हिंसा फैलाई, वैसी हिंसा यूपी की सड़कों पर दूर-दूर तक देखने को क्यों नहीं मिली? यहां पुलिस से किसी प्रदर्शनकारी ने यह पूछने की हिम्मत तक नहीं की कि, टीयर गैस और वॉटर कैनन की व्यवस्था नहीं है क्या, गर्मी लग रही है भाई!” यहां तो जब भी कोई कानून-व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश करता है, तो बाबा यूपी को ही शिमला बना देते हैं! यहां कोई प्रदर्शनकारी पुलिस के सामने ‘वास्तेगुना हुइयां’ बोलकर वीडियो बनाता भी नजर नहीं आया। आखिर क्या बाबा के लॉ एंड ऑर्डर और उनके बुलडोजर के खौफ से इस हिंसक आंदोलन का रंग यूपी में पूरी तरह फीका पड़ गया? द ट्रुथ 24 की इस खास रिपोर्ट में आइए समझते हैं।

देशव्यापी छात्र आंदोलन का केंद्र दिल्ली का जंतर-मंतर बना हुआ था। इसके अलावा मुंबई का शिवाजी गार्डन हो, कोलकाता की सड़कें हों या फिर बिहार का पटना और सीवान जिला, हर तरफ उग्र प्रदर्शन, पत्थरबाजी और पुलिस के साथ सीधी झड़प देखने को मिली। सीवान में तो नौबत यहां तक आ गई कि, एके-47 से फायरिंग तक की तस्वीरें सामने आ गईं। लेकिन दिल्ली से पूरी तरह सटे होने और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों युवाओं के जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने के बावजूद, यूपी की सीमा के भीतर कहीं एक पत्थर तक नहीं चला। न तो यूपी पुलिस को कहीं लाठीचार्ज करना पड़ा और न ही आंसू गैस के गोले दागने पड़े। आखिर जब देश के बाकी राज्यों में इतने बड़े पैमाने पर हिंसक और उग्र प्रदर्शन हो रहा था, तब यूपी में पूरी तरह से शांति कैसे बनी रही? क्या उपद्रवियों को इस बात का अच्छी तरह अहसास था कि, यह बिहार या कोई अन्य राज्य नहीं, बल्कि योगी आदित्यनाथ का उत्तर प्रदेश है?
हिंसा की आग और यूपी का सन्नाटा
अन्य राज्यों में हमने देखा कि किस तरह उपद्रवी और अराजक तत्व पुलिस के सामने खड़े होकर रील्स बना रहे थे, तंज कस रहे थे और पुलिस की लाचारी का फायदा उठा रहे थे। लेकिन उत्तर प्रदेश में किसी की यह मजाल नहीं हुई। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है योगी सरकार का स्पष्ट संदेश, आंदोलन करने का अधिकार सबको है, लेकिन आंदोलन की आड़ में उपद्रव करने की छूट किसी को नहीं है। अराजक तत्वों को बहुत अच्छी तरह पता है कि यहाँ कानून से खिलवाड़ करने का अंजाम क्या होता है। यहां पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंकने वालों को यह अच्छी तरह मालूम है कि, अगले ही दिन पोस्टर चौराहों पर टंग जाते हैं और सरकारी या निजी संपत्ति के नुकसान की भरपाई उपद्रवियों की जेब से ही वसूली जाती है। जो लोग गर्मी दिखाने की कोशिश करते हैं, उनके लिए बाबा का सीधा फॉर्मूला काम करता है—कानून हाथ में लोगे तो ‘शिमला की ठंडी हवा’ हवालात में ही महसूस करा दी जाएगी! इसी कड़े प्रशासनिक रुख का नतीजा था कि कोई भी उपद्रवी तत्व यूपी में माहौल बिगाड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
बुलडोजर का खौफ और खुफिया तंत्र की मुस्तैदी
क्या यूपी के लॉ एंड ऑर्डर का डर अराजक तत्वों के दिल में बैठ चुका है? क्या यूपी की चाक-चौबंद कानून-व्यवस्था से डरकर उपद्रवी हिंसा नहीं कर पाए? या फिर बाबा के बुलडोजर का खौफ इस कदर हावी था कि, उपद्रवियों की कोई चाल चल ही नहीं पाई? सच्चाई यह है कि जैसे ही देशव्यापी आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हुई, यूपी पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने पहले से ही अपनी तैयारी पुख्ता कर ली थी। संवेदनशील जिलों में पुलिस ने शांति समितियों और छात्र संगठनों के साथ संवाद कायम रखा। साथ ही साफ चेतावनी दे दी गई कि, अगर किसी बाहरी उपद्रवी ने छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की, तो उस पर ऐसा एक्शन होगा। जिसकी भरपाई उसकी आने वाली नस्लें करेंगी। बुलडोजर मॉडल का डर और पुलिस की इस सख्त घेराबंदी का ही असर था कि, आंदोलन का रुख यूपी पहुंचते-पहुंचते पूरी तरह शांतिपूर्ण हो गया। छात्रों ने अपनी बात रखी, ज्ञापन दिए, लेकिन एक भी जगह कानून-व्यवस्था की धज्जियां नहीं उड़ने दी गईं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात फिर साबित कर दी है कि, अगर सरकार की नीयत साफ हो और प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो बड़े से बड़े उग्र आंदोलन के बीच भी राज्य में अमन-चैन कायम रखा जा सकता है। जहां एक तरफ दूसरे राज्यों में पुलिस लाचार दिख रही थी, वहीं यूपी पुलिस का खौफ और योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति मिसाल बनकर सामने आई।
