xi jinping visit: शी जिनपिंग की सात साल बाद हो रही नॉर्थ कोरिया यात्रा से वैश्विक राजनीति में भारी हलचल है, जहां वे किम जोंग उन से मिलकर एशिया के पावर गेम में चीन के प्रभाव को फिर से मजबूत करने की कोशिश करेंगे.

xi jinping visit: दुनिया की राजनीति में इस समय एक बहुत बड़ी हलचल मची हुई है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पूरे सात साल के बाद नॉर्थ कोरिया के दौरे पर जा रहे हैं. यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब दुनिया के बड़े देशों के बीच रिश्ते तेजी से बदल रहे हैं. रूस, चीन, अमेरिका और नॉर्थ कोरिया के बीच दोस्ती और दुश्मनी के नए समीकरण बन रहे हैं. प्योंगयांग में होने वाली इस बड़ी मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं. इससे पहले सितंबर 2025 में नॉर्थ कोरिया के नेता किम जोंग उन एक कार्यक्रम के सिलसिले में बीजिंग गए थे. उसके बाद से दोनों नेताओं के बीच यह पहली आमने-सामने की बैठक होने जा रही है. इस मुलाकात से नॉर्थ कोरिया को अपने पुराने साथी चीन के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करने का मौका मिलेगा. वहीं चीन भी दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि उसका नॉर्थ कोरिया पर आज भी पूरा प्रभाव बना हुआ है.
पिछले कुछ समय में किम जोंग उन ने रूस के साथ अपनी दोस्ती को एक अलग ही मुकाम पर पहुंचा दिया है. यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस को सैनिक और हथियार भेजने के आरोपों के बीच दोनों देशों की नजदीकियां काफी बढ़ गई थीं. लेकिन अब नॉर्थ कोरिया को यह बात अच्छी तरह समझ आ रही है कि सिर्फ सेना और हथियारों के दम पर देश की तंगहाली दूर नहीं की जा सकती. देश को चलाने और वहां की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए पैसों और संसाधनों की जरूरत है. यही वजह है कि किम जोंग उन एक बार फिर अपने सबसे पुराने और बड़े मददगार चीन की तरफ उम्मीद से देख रहे हैं. जानकारों का कहना है कि किम जोंग इस बैठक के जरिए दुनिया को संदेश देना चाहते हैं कि उनका देश सिर्फ रूस पर निर्भर नहीं है. वे चीन के साथ अपनी पुरानी और पारंपरिक साझेदारी को भी हर हाल में जिंदा रखना चाहते हैं.
नॉर्थ कोरिया के पुराने नेताओं का इतिहास भी यही रहा है कि वे हमेशा बीजिंग और मॉस्को के बीच संतुलन बनाकर अपना काम निकालते थे. किम जोंग उन को भी रूस से भले ही खतरनाक सैन्य तकनीक और रणनीतिक मदद मिल जाए, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए पैसा और राशन चीन से ही मिल सकता है. नॉर्थ कोरिया के आम नागरिकों का जीवन स्तर बहुत खराब है, जिसे सुधारने के लिए चीन की आर्थिक मदद बेहद जरूरी है. किम जोंग उन भले ही मंच से आत्मनिर्भर बनने और परमाणु ताकत बढ़ाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हों, लेकिन हकीकत यही है कि वे बिना बाहरी मदद के आगे नहीं बढ़ सकते. इसीलिए इस बैठक में कई बड़े आर्थिक समझौतों पर बात हो सकती है. कयास लगाए जा रहे हैं कि चीनी सैलानियों के लिए नॉर्थ कोरिया के दरवाजे फिर से खोले जा सकते हैं और सीमा पर सालों से बंद पड़े पुलों को भी चालू किया जा सकता है.
इस पूरी मुलाकात का एक बहुत बड़ा सिरा अमेरिका से भी जुड़ा हुआ है. साल 2018 और 2019 में किम जोंग उन ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ ऐतिहासिक बैठकें की थीं. लेकिन प्रतिबंधों को हटाने और परमाणु हथियारों को खत्म करने की शर्तों पर सहमति न बनने के कारण वह बातचीत पूरी तरह ठप हो गई थी. ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद वॉशिंगटन ने फिर से बातचीत का हाथ आगे बढ़ाया है, लेकिन नॉर्थ कोरिया ने अभी तक कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है. किम जोंग उन की साफ शर्त है कि अमेरिका परमाणु हथियार खत्म करने की जिद छोड़े, तभी बात होगी. ऐसे में चीन का साथ मिलने से किम जोंग उन की ताकत बढ़ जाएगी. वे भविष्य में अमेरिका के साथ किसी भी बातचीत में ज्यादा मजबूती से अपनी शर्तें रख पाएंगे क्योंकि चीन का पीछे खड़ा होना उन्हें सुरक्षा और हौसला देता है.
दूसरी तरफ शी जिनपिंग के लिए भी यह दौरा अपनी बादशाहत कायम रखने का एक बड़ा मौका है. चीन कभी नहीं चाहेगा कि उसका पुराना पड़ोसी देश पूरी तरह से रूस के पाले में चला जाए. पुतिन और किम जोंग की बढ़ती नजदीकी ने बीजिंग की चिंता बढ़ा दी थी, इसलिए शी जिनपिंग खुद चलकर प्योंगयांग जा रहे हैं. साल 2026 में शी जिनपिंग की यह पहली विदेश यात्रा है, जिससे इस दौरे की गंभीरता का पता चलता है. खास बात यह है कि हाल ही में चीनी विदेश मंत्री की यात्रा के दौरान ‘परमाणु मुक्त नॉर्थ कोरिया’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल बंद कर दिया गया है. इससे साफ संकेत मिलता है कि चीन ने अब व्यावहारिक रूप से नॉर्थ कोरिया को एक परमाणु शक्ति संपन्न देश मान लिया है. इसके बदले में चीन भी नॉर्थ कोरिया के समुद्री रास्तों और सीमाओं पर अपना व्यापारिक फायदा उठाने की पूरी कोशिश करेगा.
