West Bengal Politics: ये आर्टिकल पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी द्वारा 60 विधायकों के साथ मिलकर अचानक विपक्ष की भूमिका में आने के बड़े सियासी उलटफेर को दर्शाता है. इसमें शुभेंदु अधिकारी के साथ हुई एक संक्षिप्त मुलाकात के बाद बदले समीकरणों और तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ते असंतोष के इनसाइड ड्रामे को उजागर किया गया है.

West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों बड़ा सियासी घटनाक्रम देखने को मिल रहा है. विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर लगातार बदलाव और असंतोष की चर्चा तेज हो गई है. इसी बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी. टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी अब पार्टी के 60 विधायकों के साथ अलग रास्ता अपनाते नजर आ रहे हैं. सबसे खास बात यह है कि उन्होंने खुद को ममता बनर्जी का विरोधी नहीं बताया है, लेकिन विधानसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका निभाने की तैयारी कर ली है. उन्होंने अपने समर्थक विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र विधानसभा अध्यक्ष को सौंप दिया है. इसके बाद उन्हें विपक्ष के नेता के कमरे की चाबी भी दे दी गई. इस कदम ने बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है.
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत चुनाव परिणाम आने के बाद मानी जा रही है. चुनाव के बाद टीएमसी के अंदर कई तरह की बैठकों का दौर शुरू हुआ. हालांकि पार्टी नेतृत्व लगातार स्थिति संभालने की कोशिश करता रहा, लेकिन धीरे-धीरे बैठकों में नेताओं और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी कम होने लगी. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा होने लगी कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है. कई विधायक और नेता सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं बोल रहे थे, लेकिन उनकी दूरी साफ दिखाई देने लगी थी. इसी माहौल के बीच कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए जिन्होंने आगे चलकर बड़ा राजनीतिक असर पैदा किया.
22 मई को मुख्यमंत्री बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी पहली बार दिल्ली पहुंचे थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात से पहले वह बंग भवन गए. इसी दौरान बंग भवन के गलियारे में उनकी मुलाकात टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी से हुई. यह मुलाकात कुछ ही सेकंड की थी, लेकिन बाद में इसी चर्चा ने राजनीतिक महत्व हासिल कर लिया. ऋतब्रत बनर्जी ने खुद बताया था कि मुख्यमंत्री ने उन्हें नमस्कार किया और प्रशासनिक बैठकों में शामिल होने का निमंत्रण दिया. जवाब में उन्होंने भी कहा कि सूचना मिलने पर वह जरूर आएंगे. उनके अनुसार दोनों के बीच लगभग 40 सेकंड की बातचीत हुई थी. उस समय उन्होंने साफ कहा था कि यह सिर्फ एक सामान्य मुलाकात थी और इसका कोई राजनीतिक मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए.
हालांकि इस मुलाकात के बाद राजनीतिक अटकलों का दौर शुरू हो गया. विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे भविष्य के संकेत के रूप में देखना शुरू कर दिया. सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा होने लगी कि ऋतब्रत बनर्जी भाजपा के करीब जा सकते हैं. उस समय उन्होंने इन सभी बातों को खारिज कर दिया था. लेकिन कुछ ही दिनों बाद हालात तेजी से बदलते दिखाई दिए. अब वही ऋतब्रत बनर्जी 60 विधायकों के समर्थन के साथ नई राजनीतिक भूमिका में सामने आए हैं. उनके इस कदम ने बंगाल की राजनीति में समीकरण बदल दिए हैं और टीएमसी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है.
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राजनीति में छोटी दिखने वाली घटनाएं भी बड़े बदलाव का कारण बन सकती हैं. बंग भवन में हुई वह संक्षिप्त मुलाकात अब राजनीतिक चर्चा का बड़ा विषय बन चुकी है. ऋतब्रत बनर्जी का नया कदम आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर सभी की नजर बनी हुई है. फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है और इसके असर आने वाले समय में और स्पष्ट दिखाई दे सकते हैं.
