एक छोटे से गांव का लड़का, जो देहरादून के डीएवी कॉलेज में बैठकर वकालत की पढ़ाई कर रहा था। सपना था कि एक दिन बड़ा वकील बनेगा, अदालत में दलीलें देगा और एक सम्मानजनक जिंदगी जिएगा, लेकिन शायद किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही लिख रखा था। एक ऐसी कहानी, जो अदालत के कमरों से निकलकर सड़कों पर संघर्ष की आवाज बनने वाली थी। एक ऐसा नाम, जो आने वाले सालों में दलित राजनीति की सबसे बड़ी उम्मीद और सबसे बड़े विवाद, दोनों का केंद्र बनने वाला था, उस लड़के का नाम था— चंद्रशेखर आजाद, वकालत की पढ़ाई के दौरान एक दिन घर से खबर आई कि उनके पिता की तबीयत अचानक खराब हो गई है और उन्हें सहारनपुर के मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है। खबर मिलते ही चंद्रशेखर अस्पताल पहुंच गए। पिता की सेवा करते हुए उनकी नजर अस्पताल में काम करने वाले दलित और पिछड़े वर्ग के सफाई कर्मचारियों पर पड़ी। उन्होंने देखा कि किस तरह उनके साथ भेदभाव किया जाता है। ऊंची जाति के कुछ कर्मचारी और अधिकारी उन्हें अपमानित करते हैं। गरीब मरीजों को भी कई बार दुत्कार कर भगा दिया जाता है। यह सब देखकर चंद्रशेखर के भीतर गुस्सा भर गया। उन्होंने महसूस किया कि किताबों में बराबरी की बातें हैं, लेकिन जमीन पर आज भी बड़ी आबादी सम्मान के लिए संघर्ष कर रही है। यही वह पल था जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
भीम आर्मी का जन्म… शिक्षा से शुरू हुआ सफर
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने साथी विनय रतन सिंह के साथ मिलकर भीम आर्मी की शुरुआत की। शुरुआत में इसका मकसद राजनीति नहीं था। लक्ष्य था दलित और गरीब बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था करना। गांव-गांव में छोटी-छोटी पाठशालाएं खोली गईं। नारा था— “शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो।” लेकिन जल्द ही यह संगठन सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। यह सामाजिक न्याय और दलित अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बनने लगा।
2015… “द ग्रेट चमार्स” बोर्ड ने बदली तकदीर
साल 2015 में एक ऐसी घटना हुई जिसने चंद्रशेखर को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। उनके गांव घड़कौली के बाहर एक बोर्ड लगाया गया, जिस पर लिखा था— “द ग्रेट चमार्स ऑफ घड़कौली आपका स्वागत करते हैं।” यह सिर्फ एक बोर्ड नहीं था, बल्कि सदियों से दबाए गए आत्मसम्मान का ऐलान था। लेकिन इलाके के दबंगों को यह पसंद नहीं आया। विवाद बढ़ा, तनाव पैदा हुआ और देखते ही देखते चंद्रशेखर का नाम पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया।
सहारनपुर हिंसा से संसद तक… जेल ने बनाया नेता
इसके बाद सहारनपुर हिंसा ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। दलितों और ठाकुर समुदाय के बीच हुए टकराव के बाद चंद्रशेखर का नाम पूरे देश में सुर्खियों में आ गया। उन पर कई गंभीर आरोप लगे, गिरफ्तारी हुई और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून तक लगाया गया, लेकिन जेल जाने के बाद भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई। बल्कि दलित युवाओं के बीच उनका कद और बढ़ गया। बहुत से लोगों ने उन्हें नए दौर की दलित राजनीति का चेहरा मानना शुरू कर दिया।
2022 की हार से 2024 की जीत… 0.5% से 51% का सफर
इसके बाद चंद्रशेखर ने राजनीति में कदम रखा और आजाद समाज पार्टी की स्थापना की। हालांकि शुरुआत आसान नहीं थी। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने लगभग पूरे प्रदेश में चुनाव लड़ा, लेकिन प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा।
पार्टी का वोट शेयर आधे प्रतिशत से भी कम रहा और अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। राजनीतिक विश्लेषकों ने कहना शुरू कर दिया कि सड़क की राजनीति और चुनावी राजनीति में बड़ा फर्क होता है।
लेकिन चंद्रशेखर ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपना जनसंपर्क जारी रखा और 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से मैदान में उतर गए। इस बार नतीजा चौंकाने वाला था। उन्होंने लगभग 51 प्रतिशत वोट हासिल करते हुए भारी अंतर से जीत दर्ज की और संसद पहुंच गए।
यह जीत सिर्फ एक सीट की जीत नहीं थी, बल्कि इस बात का संकेत थी कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर ने अपना एक मजबूत सामाजिक आधार तैयार कर लिया है।
सांसद बनने के बाद बदले रावण?
हालांकि बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है। क्या नगीना की जीत को पूरे उत्तर प्रदेश में दोहराया जा सकता है? क्या सांसद बनने के बाद भी चंद्रशेखर के पास वही जमीनी पकड़ है, जो पहले हुआ करती थी?
सांसद बनने से पहले वह लगातार धरनों में दिखते थे, पीड़ित परिवारों के घर पहुंचते थे, गांवों में रात बिताते थे और लोगों के मुद्दों को लेकर सड़क पर उतर जाते थे। अब वह तस्वीरें अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं।
यही वजह है कि उनके विरोधी सवाल उठाते हैं कि क्या सांसद बनने के बाद चंद्रशेखर की राजनीति बदल गई है?
आंकड़े क्या कहते हैं
आंकड़ों की बात करें तो 2024 में नगीना की जीत के बावजूद पूरे उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी का वोट शेयर लगभग 0.49 प्रतिशत ही रहा। यानी राज्यव्यापी संगठन अभी भी सीमित है।
हालांकि उपचुनावों में उनकी पार्टी ने कुछ सीटों पर बहुजन समाज पार्टी को पीछे छोड़कर तीसरा स्थान हासिल किया, जिससे यह संकेत जरूर मिला कि दलित युवाओं का एक वर्ग तेजी से उनकी तरफ आकर्षित हो रहा है, आज उत्तर प्रदेश की राजनीति में चंद्रशेखर आजाद एक दिलचस्प मोड़ पर खड़े हैं। एक तरफ वे दलित युवाओं के बीच उम्मीद का चेहरा हैं, दूसरी तरफ उन्हें यह साबित करना है कि वह सिर्फ आंदोलनकारी नेता नहीं, बल्कि बड़े चुनावी खिलाड़ी भी बन सकते हैं।
नगीना की जीत ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दी है, लेकिन 2027 का विधानसभा चुनाव तय करेगा कि चंद्रशेखर आजाद सिर्फ एक सांसद हैं या उत्तर प्रदेश की राजनीति का अगला बड़ा अध्याय, देहरादून के डीएवी कॉलेज से वकालत का सपना देखने वाला लड़का आज संसद में बैठता है। अदालत के कमरों से निकलकर सड़कों पर संघर्ष करने वाला अब नीति बनाने की जगह पर है।
लेकिन सड़क से संसद तक का सफर आसान था, संसद से सत्ता तक का रास्ता मुश्किल है। 0.5% वोट शेयर को 35% तक ले जाना, 1 सीट को 200 सीटों में बदलना… इसके लिए सिर्फ आंदोलन नहीं, संगठन चाहिए, गठबंधन चाहिए, 2024 ने बताया कि चंद्रशेखर नगीना जीत सकते हैं। 2027 बताएगा कि क्या वो यूपी जीत सकते हैं।
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