Delimitation explained: संसद में परिसीमन को लेकर हंगामा हो रहा है. विपक्ष लगातार इसके विरोध में है, तो वहीं सरकार इसे पारित करवाना चाहती है. क्या आप जानते हैं कि परिसीमन क्या होता है? इसे कैसे लागू किया जाता है? इसका विरोध क्यों हो रहा है? इन सभी बातों को इस रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है.

संसद का विशेष सत्र आज से शुरू हो गया है. संसद में आज 3 बिलों को पेश किया गया है, जिनके जरिए लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी हो जाएगी. इन बिलों का सीधा मकसद लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण को लागू करना और नए सिरे से परिसीमन करना है. माना जा रहा है कि इसके बाद देश में लोकसभा की सीटें लगभग 850 हो सकती हैं. इस रिपोर्ट में आपको बता रहे हैं कि आखिर परिसीमन क्या होता है और किस आधार पर सीटों की संख्या को बढ़ाया जाएगा.
क्या होता है परिसीमन?
परिसीमन का मतलब चुनाव लड़ने के क्षेत्रों की सीमाएं या संख्या को तय करना या फिर उसे बदला होता है. अगर सीधे शब्दों में कहा जाए तो चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं में आने वाले बदलाव को ही परिसीमन कहते हैं. आपको बता दें कि सरकार जनसंख्या और इलाके के जनसंख्या घनत्व के आधार पर बदलावों को तय करती है. ये नगर निगम के वार्ड से लेकर के लोकसभा की सीटों तक होता है. अगर उदाहरण के शब्दों में कहें तो अगर आप लखनऊ में कहते हैं, तो वहां की लोकसभा सीटों की एक समय सीमा होगी, जिसमें रहने वाले लोग उस सीट पर जनप्रतिनिधी को चुनते हैं. इसी सीमा में परिसीमन के जरिए बदलाव किया जाता है.
कैसे बढ़ेंगी सीटें?
परिसीमन के पास होने के बाद संविधान के कुछ अनुच्छेदों में बदलाव किया जाएगा, जिससे सीटों को मौजूदा जनसंख्या के आधार पर बांटा जा सकेगा. विधेयक के मुताबिक लोकसभा में सदस्यों की संख्या में वृद्धि आकर वह 815 तक हो सकती है. इसी के साथ केंद्र शासित प्रदेशों में 35 सीटों तक सीटें हो सकती हैं. यानी अगर देखा जाए तो इसके पास होने के बाद कुल सीटें 850 हो जाएंगी.
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परिसीमन के आने से क्या हो जाएगा?
आपको बता दें कि फिलहाल में सीटों की संख्या साल 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई है, जिससे सीटों को मौजूदा जनसंख्या के आधार पर बांटा जा सके. सरकार का कहना है कि काफी समय से सीटों का बंटवारा रुका हुआ है और इससे वह रोक हट जाएगी और एक परिसीमन आयोग बनेगा, जो नए चुनावी क्षेत्रों को तय करेगा. आपको बता दें कि नए विधेयक के मुताबिक जनगणना के आधार पर परिसीमन करके महिला आरक्षण को लागू किया जा सकेगा. आरक्षित सीटों को अलग-अलग चुनावों में बदला जाता रहेगा, जिससे सभी क्षेत्रों की महिलाओं को मौका मिलता रहेगा.
परिसीमन का सीधा मकसद देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का फिर से गठन करना है. इस बिल के पास होने के बाद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नवीनतम जनगणना के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाई जाएगी. इसी के साथ संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को भी नए सिरे से तय किया जाएगा, जिससे सभी क्षेत्रों में जनसंख्या के मुताबिक संतुलन बना रहे.
क्यों हो रहा है परिसीमन का विरोध?
आपको बता दें कि साल 2001 और 2003 में संविधान में किए गए सुधारों के बाद सीटों को फिर ने निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर ही 2026 तक के लिए रोका गया था. यानी कि इस दौरान जनसंख्या में बदलाव के बाद भी सीटों की संख्या में बढ़ेतरी नहीं हो सकी थी. लेकिन अब इस नए बिल में इस पूरी व्यवस्था को बदलने का दावा किया जा रहा है.
आपको बता दे कि इसमें अनुच्छेद 81 की धारा 3 में संशोधन करते हुए यह जोड़ा गया है कि जनसंख्या का मतलब वह होगा, जो संसद कानूनी को बनाकर तय करेगी. किसी जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाए. सरकार इस रोक को हटाकर नवीनतम जनगणना के आधार पर परिसीमन का रास्ता खोलना चाहती है. इसी बात को लेकर विपक्ष का कहना है कि इसमें इतनी ज्यादा जल्दबाजी क्यों की जा रही है.
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आखिरी बार कब लागू हुआ था परिसीमन?
देश में पहले 489 सीटें थी, जिसके बाद साल 1963 में सीटों में बढ़ोतरी होकर इनकी संख्या 522 हो गई. जिसके बाद साल 1973 में 1971 की जनगणना के आधार पर 543 सीटें कर दी गईं. जिसके बाद आज तक वे इसी तरह हैं. साल 2001 तक सीटों के बंटवारे को फ्रीज कर दिया गया था और उसके बाद संशोधन के जरिए इसे साल 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया था. साल 2002 में आखिरी बार परिसीमन हुआ था, लेकिन सीटों की संख्या की जगह सीमा में बदलाव लाया गया था.
जिसके बाद अब सरकार एक संशोधन को लाकर साल 2026 को खत्म होने से पहले परिसीमन करवाना चाहती है. आपको बता दें कि परिसीमन आयोगों का भारत में 4 बार गठन किया जा चुका है. जिनमें साल 1952 में परिसीमन आयोग अधिनियम- 1952 के अधीन, 1963 में परिसीमन आयोग अधिनियम- 1962 के अधीन, 1973 में परिसीमन अधिनियम, 1972 और 2002 में परिसीमन अधिनियम- 2002 के अधीन शामिल हैं.
इस तरह से होगी परिसीमन?
अगर इस बिल को लागू किया जाता है, तो उसके बाद इस बिल के जरिए एक परिसीमन आयोग को बनाया जाएगा. इस आयोग के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड या फिर कार्यरत न्यायाधीश को बनाया जाएगा. इस आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त या फिर उनके द्वारा नामित कोई चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त के सदस्य शामिल होंगे. जिसके बाद परिसीमन आयोग सभी प्रस्तावों को सार्वजनिक करेगा और लोगों से सुझाव और आपत्तियों के बारे में भी बात करेगा. इस तरह से लास्ट और फाइनल फैसला गजट में प्रकाशित होने के बाद प्रभावी होगा और इसके बाद में चुनावों को परिसीमन के आधार पर कराया जाएगा.
कितनी बढ़ जाएंगी सीटें?
हालांकि अभी यह फाइनल डेटा नहीं दिया गया है कि किस राज्य में कितनी सीटों को बढ़ाया जाएगा. फिलहाल संसद में पेश होने वाले परिसीमन बिल के पारित होने के बाद इसके तहत लोकसभा कुल सीटें 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी. इसके बाद 815 सीटें राज्यों में होंगी और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों में हो जाएंगी. हालांकि अभी हर राज्य के हिसाब से सटीक संख्या बिल में तय नहीं की गई है. सीटों की संख्या में बढ़ोतरी को साल 2026 में जनगणना के बाद परिसीमन आयोग तय करेगा. हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि 50% तक सीटों को बढ़ाया जा सकता है.
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