rafale fighter jet mega deal: भारत 114 राफेल फाइटर जेट के लिए फ्रांस से करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की महाडील करने जा रहा है, लेकिन इसमें न टेक्नोलॉजी ट्रांसफर है और न ही सोर्स कोड साझा किया जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय वायुसेना की फ्रांस पर निर्भरता बनी रहेगी, हालांकि सीमित विकल्पों के चलते राफेल फिलहाल सबसे व्यावहारिक जरूरत भी बन गया है.

rafale fighter jet mega deal: भारत और फ्रांस के बीच राफेल लड़ाकू विमानों को लेकर एक बड़ी डील पर बातचीत शुरू होने वाली है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने की तैयारी कर रहा है. इस सौदे की अनुमानित कीमत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये यानी लगभग 36 अरब डॉलर बताई जा रही है. कहा जा रहा है कि फरवरी में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं. लेकिन इस महाडील को लेकर कई गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं.
फ्रांसीसी रक्षा वेबसाइट एवियन्स लेजेंडायर्स के मुताबिक, इस डील में 114 में से 90 विमान राफेल F4 वैरिएंट के होंगे, जबकि 24 विमान F5 वैरिएंट के होंगे. F5 वैरिएंट का निर्माण फ्रांस में ही किया जाएगा. भारत में बने हिस्सों की हिस्सेदारी सिर्फ 30 प्रतिशत तक सीमित रहेगी. इससे साफ है कि यह सौदा मेक इन इंडिया के दावों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता. सबसे अहम बात यह है कि फ्रांस इस डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर देने को तैयार नहीं है.
इस सौदे को लेकर सबसे बड़ा विवाद सोर्स कोड को लेकर है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि फ्रांस राफेल का सोर्स कोड भारत के साथ साझा नहीं करेगा. इसका मतलब यह हुआ कि भारत भविष्य में अपनी जरूरत के अनुसार स्वदेशी हथियारों को राफेल में स्वतंत्र रूप से जोड़ नहीं पाएगा. हर अपग्रेड और बदलाव के लिए फ्रांस पर निर्भरता बनी रहेगी. इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बावजूद यह चिंता का विषय माना जा रहा है.
भारतीय वायुसेना के पूर्व अधिकारी और सैन्य विश्लेषक विजयेन्द्र के ठाकुर ने इस डील पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि 30 प्रतिशत स्वदेशीकरण का दावा भ्रामक है. असल में इसमें कोई टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नहीं है. जो भारतीय पार्ट्स लगाए जाएंगे, वे पहले से भारत में विकसित तकनीक से बने होंगे. ठाकुर का कहना है कि बिना सोर्स कोड के भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन सकता है.
हालांकि वायुसेना के पास ऑप्शन सीमित हैं. भारतीय वायुसेना पहले से राफेल विमान ऑपरेट कर रही है. इसके लिए ट्रेनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स पर पहले ही भारी निवेश हो चुका है. यही वजह है कि राफेल को अपनाना आसान माना जा रहा है. एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी साफ कर चुके हैं कि राफेल वायुसेना की प्राथमिकता में शामिल है, क्योंकि यह पहले ही टेस्टेड और भरोसेमंद साबित हो चुका है.
इस पूरे मामले में DRDO और HAL की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को हर तकनीक का पूरा ट्रांसफर नहीं चाहिए, बल्कि कुछ खास क्षेत्रों में मदद की जरूरत है, जैसे अत्याधुनिक इंजन तकनीक. लेकिन जब तक स्वदेशी परियोजनाएं पूरी तरह तैयार नहीं होतीं, तब तक वायुसेना को अपनी ताकत बनाए रखने के लिए विदेशी विकल्पों पर निर्भर रहना मजबूरी बन गया है. यही वजह है कि राफेल डील को जरूरत और चुनौती भी माना जा रहा है.
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