us europe trade tariff: अमेरिका ने ग्रीनलैंड विवाद को लेकर यूरोप के आठ देशों पर 10% टैरिफ लगाकर रिश्तों में तनाव बढ़ा दिया है. विशेषज्ञों के मुताबिक यह टैरिफ जंग बढ़ी तो नुकसान सिर्फ यूरोप नहीं, बल्कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था को भी झेलना पड़ेगा.

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह टैरिफ विवाद अगर आगे बढ़ता है, तो नुकसान सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा. अमेरिका को भी इसके नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं. इसका असर सीधे व्यापार, उद्योग और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ेगा. अमेरिका और यूरोप एक-दूसरे के बड़े व्यापारिक साझेदार हैं. हर साल दोनों के बीच अरबों डॉलर का कारोबार होता है. अमेरिका यूरोप को ऊर्जा, तकनीक और रक्षा से जुड़े उत्पाद देता है. वहीं यूरोप से अमेरिका को मशीनरी, ऑटो पार्ट्स, केमिकल और दवाएं मिलती हैं.
अगर दोनों तरफ से आयात शुल्क बढ़ते हैं, तो यूरोपीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में टिकना मुश्किल हो सकता है. इससे निर्यात और रोजगार पर असर पड़ेगा. दूसरी ओर, अमेरिकी कंपनियों को भी यूरोप में ज्यादा लागत का सामना करना पड़ेगा. इससे उनकी बिक्री और मुनाफा घट सकता है. यानी टैरिफ का बोझ दोनों पक्षों पर पड़ेगा.
ऊर्जा के मामले में भी यूरोप अमेरिका पर काफी निर्भर हो चुका है. रूस पर प्रतिबंधों के बाद यूरोप अमेरिकी एलएनजी और कच्चे तेल पर ज्यादा निर्भर है. इससे यूरोप को ऊर्जा सुरक्षा तो मिली है, लेकिन कीमतें बढ़ गई हैं. लंबी दूरी से आने वाली सप्लाई के कारण ऊर्जा दरों में उतार-चढ़ाव बना रहता है. अगर रिश्तों में और खटास आई, तो ऊर्जा सप्लाई भी दबाव का जरिया बन सकती है.
तकनीक और रक्षा क्षेत्र में भी यूरोप की निर्भरता अमेरिका पर है. सेमीकंडक्टर, एआई और डिफेंस सिस्टम में अमेरिकी कंपनियों का दबदबा है. लंबे समय तक टैरिफ रहे, तो निवेश और बैंकिंग सेक्टर पर भी असर पड़ेगा. विशेषज्ञों का कहना है कि तनाव बढ़ा तो यूरोप की जीडीपी पर 0.5 से 1 प्रतिशत तक दबाव आ सकता है. फिलहाल अमेरिका ने डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड और फिनलैंड पर यह टैरिफ लगाया है.
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