Dehradun News:देहरादून-दिल्ली एक्सप्रेसवे अपने उद्घाटन से ठीक पहले अंतिम निर्माण चरण में पहुंच चुका है. आधुनिक विकास की इस बड़ी परियोजना के बीच आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है देहरादून मार्ग स्थित प्रसिद्ध डाट काली मंदिर, जिसका इतिहास और महत्व आज भी लोगों की गहरी श्रद्धा से जुड़ा हुआ है.
जानिए पूरी खबर
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास वर्ष 1804 से जुड़ा है, जब ब्रिटिश शासन के दौरान दिल्ली से देहरादून को जोड़ने के लिए सड़क निर्माण का कार्य शुरू किया गया था. उस समय पहाड़ के बीच से सुरंग बनाने का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन दिनभर की मेहनत के बावजूद हर शाम सुरंग ढह जाया करती थी. यह सिलसिला लगभग एक महीने तक चलता रहा, जिससे निर्माण कार्य पूरी तरह बाधित हो गया. किवदंति के अनुसार, इसी दौरान एक रात देवी ने एक कर्मी के सपने में आकर बताया कि उस स्थान पर उनका पवित्र पत्थर (पिंडी) स्थित है, जिसे हटाया गया है. देवी ने निर्देश दिया कि उस पिंडी को पुनः स्थापित किया जाए और पूजा-अर्चना की जाए. इसके बाद मंदिर की स्थापना की गई और जैसे ही विधिवत पूजा हुई, सुरंग निर्माण बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक पूरा हो गया.
ये है मंदिर का इतिहास
मंदिर का नाम ‘डाट काली’ भी इसी इतिहास से जुड़ा है. ‘डाट’ शब्द स्थानीय भाषा में सुरंग के लिए इस्तेमाल होता है, जिससे इस स्थान की पहचान बनी. तभी से यह मान्यता है कि किसी भी बड़े निर्माण कार्य, विशेष रूप से इस मार्ग से जुड़े विकास कार्यों से पहले मां डाट काली का आशीर्वाद लेना आवश्यक होता है. अब जब देहरादून-दिल्ली एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करीब है, तो एक बार फिर यह मंदिर चर्चा के केंद्र में है. प्रधानमंत्री के प्रस्तावित दौरे को लेकर मंदिर को फूलों से सजाया जा रहा है और आसपास के इलाके में साफ-सफाई और सौंदर्यीकरण का काम तेज़ी से किया जा रहा है.
मंदिर के जूनियर महंत शुभम गोस्वामी के अनुसार, ‘जब 1804 में यहां पहली बार सड़क बन रही थी, तो सुरंग बार-बार ढह जाती थी. मां के निर्देश के बाद ही निर्माण कार्य सफल हुआ. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मां का आशीर्वाद लेने यहां आ सकते हैं, जिसके बाद एक्सप्रेसवे और टनल का उद्घाटन किया जाएगा’.
कनेक्टिविटी
एक्सप्रेसवे के शुरू होने से श्रद्धालुओं के लिए मंदिर तक पहुँचना अब पहले से कहीं अधिक सुगम और तेज हो जाएगा.
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