उत्तर प्रदेश को लेकर एक बात हमेशा कही जाती है कि यहां की राजनीति को समझना है तो जातीय समीकरण को समझना होगा। और अगर यूपी की राजनीति में किसी एक नेता ने जातीय समीकरण को सबसे बेहतर तरीके से साधा है, तो वो नाम है मायावती। एक समय ऐसा था जब उत्तर प्रदेश में चुनाव की चर्चा मायावती के बिना पूरी नहीं होती थी। दलित राजनीति की सबसे बड़ी नेता… चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री… और ऐसी नेता जिसने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर इतिहास रच दिया था। लेकिन फिर वक्त बदला। सत्ता हाथ से निकल गई। बहुजन समाज पार्टी लगातार कमजोर पड़ती चली गई। बड़े-बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए। लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। राजनीतिक विश्लेषकों ने कहना शुरू कर दिया कि बसपा अब खत्म हो चुकी है। लेकिन राजनीति में जो दिखाई देता है, हमेशा वही सच नहीं होता। मायावती चुप रहीं… लेकिन राजनीति करती रहीं।दिल्ली में बैठकर यूपी की राजनीति पर नजर रखती रहीं। रणनीति बनाती रहीं। और अब ऐसा लग रहा है कि मायावती ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपना सबसे बड़ा दांव चल दिया है। और इस दांव का नाम है… ब्राह्मण वोट बैंक।

बसपा की रैलियों ने दिया बड़ा संकेत
कुछ समय पहले बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जयंती के मौके पर आकाश आनंद ने नोएडा और लखनऊ में बड़े कार्यक्रम किए। इन कार्यक्रमों में भारी भीड़ देखने को मिली। सड़कों पर नीले झंडों का सैलाब दिखाई दिया, कई जगह प्रशासन को व्यवस्था संभालने में मशक्कत करनी पड़ी। बसपा समर्थक इसे इस बात का संकेत मान रहे हैं कि दलित वोट बैंक आज भी मायावती के साथ मजबूती से खड़ा है। अगर यह दावा सही है, तो फिर मायावती की अगली चुनौती दलित वोट को बचाने की नहीं बल्कि उसके साथ नए सामाजिक वर्गों को जोड़ने की है और इसी वजह से ब्राह्मणों पर फोकस बढ़ता दिखाई दे रहा है।
ब्राह्मणों पर क्यों मेहरबान हैं मायावती?
अगर पिछले कुछ महीनों में मायावती के बयान और सोशल मीडिया पोस्ट देखें तो एक बात साफ दिखाई देती है। मायावती लगातार ब्राह्मणों से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बोल रही हैं। चाहे ब्राह्मण समाज के खिलाफ की गई किसी टिप्पणी का मामला हो… या फिर किसी फिल्म और विवाद को लेकर ब्राह्मण संगठनों की नाराजगी… मायावती ने कई मौकों पर ब्राह्मणों के पक्ष में आवाज उठाई है। सवाल है आखिर क्यों? जबकि ब्राह्मण वोटर का बड़ा हिस्सा इस समय बीजेपी के साथ माना जाता है। तो फिर मायावती आखिर ब्राह्मणों को साधने की कोशिश क्यों कर रही हैं? इसका जवाब छिपा है साल 2007 में।
2007 का फॉर्मूला फिर लागू होगा?
यूपी की राजनीति में साल 2007 एक ऐतिहासिक साल माना जाता है। क्योंकि उसी साल मायावती ने वो कर दिखाया था जिसे असंभव माना जा रहा था। उन्होंने दलित और ब्राह्मण वोट बैंक को एक साथ जोड़ दिया था।उस समय बसपा ने नारा दिया था… हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है और इसका असर ये हुआ कि बसपा को पूर्ण बहुमत मिला। 403 सदस्यीय विधानसभा में बसपा ने 206 सीटें जीत ली थीं। मायावती मुख्यमंत्री बनीं और पूरे देश में उनके सोशल इंजीनियरिंग मॉडल की चर्चा होने लगी, उस मॉडल के सबसे बड़े शिल्पकार थे सतीश चंद्र मिश्रा। आज भी सतीश मिश्रा मायावती के सबसे भरोसेमंद सलाहकारों में गिने जाते हैं, यानी जिस फॉर्मूले ने 2007 में मायावती को सत्ता दिलाई थी, वही फॉर्मूला एक बार फिर चर्चा में है।
यूपी का जातीय गणित क्या कहता है?
अब जरा यूपी का जातीय समीकरण समझिए। उत्तर प्रदेश में….
दलित आबादी लगभग 21 प्रतिशत
ब्राह्मणों की आबादी करीब 10 से 12 प्रतिशत
मुस्लिम आबादी लगभग 19 प्रतिशत है
ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत
अब अगर दलित वोट पूरी तरह बसपा के साथ रहता है और उसमें ब्राह्मणों का एक बड़ा हिस्सा जुड़ जाता है, तो मायावती की राजनीतिक ताकत अचानक कई गुना बढ़ सकती है और यूपी में बसपा की सत्ता वापसी का रास्ता आसान हो जाएगा, यही वजह है कि बसपा का पूरा फोकस एक बार फिर ब्राह्मणों पर दिखाई दे रहा है।
योगी और अखिलेश की बढ़ सकती है टेंशन
बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत सामाजिक गठबंधन है, ब्राह्मण, गैर-यादव ओबीसी और बड़ा हिंदू वोट बैंक बीजेपी के साथ माना जाता है, वहीं समाजवादी पार्टी पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने में जुटी हुई है, लेकिन अगर मायावती दलित वोट बैंक को संभालते हुए ब्राह्मणों का एक हिस्सा अपनी तरफ खींचने में सफल हो जाती हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान बीजेपी और सपा दोनों को हो सकता है। यही वजह है कि मायावती की हर राजनीतिक गतिविधि पर दोनों पार्टियों की नजर बनी हुई है।
क्या 2027 में फिर चौंकाएंगी मायावती?
राजनीति में अक्सर वही नेता सबसे खतरनाक साबित होता है जो ज्यादा शोर नहीं करता। मायावती आज भी सार्वजनिक मंचों पर कम दिखाई देती हैं। लेकिन उनकी राजनीतिक रणनीति लगातार आगे बढ़ रही है। 2007 का फॉर्मूला आज भी लोगों को याद है।दलित वोट बैंक आज भी बसपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। आकाश आनंद को आगे लाकर नई पीढ़ी को जोड़ने की कोशिश भी जारी है और अब ब्राह्मणों की तरफ बढ़ते कदम इस बात का संकेत दे रहे हैं कि मायावती 2027 की लड़ाई को लेकर पूरी तैयारी में हैं।
राजनीति में कभी किसी खिलाड़ी को समय से पहले खत्म नहीं मानना चाहिए। बहुजन समाज पार्टी भले सत्ता से दूर हो, लेकिन मायावती अभी भी यूपी की राजनीति का ऐसा नाम हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दलितों का भरोसा, ब्राह्मणों को साधने की कोशिश और 2007 के सोशल इंजीनियरिंग मॉडल की याद… अगर ये तीनों चीजें एक साथ आ गईं तो 2027 का चुनाव यूपी की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर सकता है। और यही वजह है कि आज सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मायावती क्या कर रही हैं… सवाल ये है कि क्या मायावती चुपचाप 2027 की सबसे बड़ी सियासी वापसी की तैयारी कर रही हैं?
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