सरकार चुनाव से पहले कई सारे वादे करती है, जिससे की जनता उनको वोट दें. जैसे ही लेकिन चुनाव खत्म हो जाता है. वह अपने वादों में से किसी भी काम को नहीं करते हैं. ऐसा ही एक मुद्दा संसद में आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने उठाया है. दरअसल, उन्होंने संसद में कहा हैं कि अगर कोई भी नेता चुनाव में वादा करता है लेकिन बाद में चुनाव जीत जाने के बाद जनता को संतुष्ट नहीं कर पाता हैं. तो वोट देने वालों के पास उनको हटाने का भी अधिकार होना चाहिए. सोशल मीडिया में इसके बाद से राघव चड्ढा की काफी सरहाना की जा रही है. हर जगह वहीं छाए हुए है. कई लोग तो ये भी कहते दिखाई दें रहे हैं कि यहीं एक नेता है. जो की अभी के मुद्दों पर बात कर रहे हैं और धीरे-धीरे Genz की दिलों पर राज कर रहे हैं.
ऐसे में कई लोगों के मन में ये बात आ रही है कि क्या राघव चड्ढा ने जो मुद्दा उठाया है. वह किन-किन देशों में लागू हो रखा है. आइए जानते हैं.
किन देशों में हैं लागू
दरअसल, राइट टू रिकॉल की बात करें कि वह किन-किन देशों में लागू है. तो बता दें कि ये कई देशों में तो नहीं लेकिन लैटिन अमेरिकी देशों में लागू है. वहीं, स्विटजरलैंड में इस व्यवस्था को लागू किया गया है.
भारत में इन पदों के लिए है राइट टू रिकॉल सिस्टम
हालांकि, भारत में ये हर जगह तो नहीं लेकिन किसी-किसी राज्यों में है. इनमें राजस्थान और कर्नाटक राज्य शामिल है. लेकिन हर पदों के लिए ये नियम नहीं बल्कि पंचायत स्तर पर आप काम अच्छा न लगने पर उस नेता को पद से हटा सकते हैं.
इसके अलावा भारत में भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और जजों के लिए महाभियोग है. अगर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति , सुप्रीम और हाईकोर्ट के न्यायधीश संविधान का उल्लंघन करते हैं या उस पद के लिए वह योग्य नहीं है. तो ऐसे में विभिन्न चरणों को फॉलों करके उनको पद से हटाया जा सकता है.
हालांकि, अब देखना यह हैं कि अगर बड़े पदों के लिए राइट टू रिकॉल है तो छोटे पदों पर ये सिस्टम लागू होता है या नहीं.
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